वैसे तो हमेशा ही भीड होती थी
उसी गली के उसी नुक्कड पे
वो फिरभी रहा अकेला
अपनेमे ही खोया हुआ..हमेशा..
कभी हसता था..
कभी गाता भी था..
अपने ही धुन मे ना जाने
क्या क्या छुपाता था..
दर्द तो देखा है
हरेक ने उसकी आंखोमे
गम का वो आसु लेकीन
न जाने कहा छिपाके रखा था
उसे मिले हर शख्स के मन मे
रहा हमेशा एक सवाल
उसकी हसी मे छिपे उस सन्नाटेका
दर्द से भरी उन मुर्दा आखोंका..
और्..और् ...
उससे जुडे उसके खालीपनका..
किसीने पुछा होता तो शायद जवाब मिलता..
पर..शायदही.. क्योंकी..
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उसी गली के उसी नुक्कड पे
वो आजभी खडा है
थोडा घबराया...थोडा सहमासा.
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