कोर्नर का वो लंबासा लम्पपोस्ट
और उसके निचे खडा छोटासा वो..
अपने सपनोंकी उंचाई नापता हुआ..
कुछ अजीबही चमकति थी उसकी आंखे
उस उंचे लम्प की पीली रोशनीमे..
एक अलगही चाह थी उसे..
और..
और..
हा और शायद इंतजार था उसे..
ना ना... कोई मेहबुबा ना थी
ना ही ये कोई आशिक़ था..
वो इंतजार तो बस अपने मौत का था..
कहने को तो पागल कह भी देते लोग उसे..
उलझे हुए सवालोंमे सुलझा हुआ पागल..
सतरंगी ख्वाब देखनेवाला जिद्दी पागल...
हर एक पल मर्जीसे जीनेवाला पागल...
और्..
मौत की चाह मे सांसे गिनता वो पागल..
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लेकीन किसी ने कुछ ना कहा..
शायद उन मे भी कही छुपा था
वो पागल.......
और शायद इसीलिये.....
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उसी गली के उसी नुक्कड पे
वो आज भी खडा है..
सपनो से भरा उसका हर पल
उस इंतजार मे जीता हुआ
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