Friday, July 21, 2017

उसी गली के उसी नुक्कड पे

उसी गली के उसी नुक्कड पे
वो दिखता था कभीकभी
थोडा घबराया…थोडा सहमासा..
न जाने क्या खोया है उसने
जो ढूंढता है दिनरात
कभी खुले आसमान मे
तो कभी कोने मै फ़ैली उस रेत मे
आते जाते लोग देखते थे उसे
कुछ हसते थे..कुछ रोते भी थे
पर ना पुछा किसिने के
“बाबा क्या ढुंढ रहे हो?
खोया हुआ बचपन
गुजरी हुइ जवानी
या…या…आनेवाला कल?”
पुछते तो शायद जवाब मिल जाता
उन खाली आंखोमे छिपे सवालोंका
जिसे वो अक्सर ढुंढा करता था
उन टुटे तारोंमे..पत्थर की लकिरोमे…
लेकिन्….
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उसी गली के उसी नुक्कड पे
वो आजभी खडा है
थोडा घबराया…थोडा सहमासा..

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