Monday, May 2, 2016

कोई अपनी मुस्कुराहट आपसे बांटना चाहे तो उसे मना नहीं करते बेटा...
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सिग्नलपासून साधारण 100 मी वरचा गाड्यांचा वेग हा बघण्यासारखा असतो... हिरवा दिवा ते पिवळा आणि पिवळा ते लाल होईपर्यंतची त्यांची धावपळ विलक्षण... पण खरा कस कुठे लागतो माहितेय? सिग्नल लाल होताना योग्य ठिकाणी थांबण्यात... करकचून ब्रेक मारावा लागतो.. धक्का बसतो.. चार शिव्याही निघतात..पण अति घाईत होणारा पुढचा अपघातही टळतो... आपले बरेचसे निर्णयही असेच असतात नं ... नेमक्या क्रोसिंगला थांबलेले... नाहीतर अपघात अटळ
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याद है.…? 
शहर के बीचोंबीच एक पुराना बरगद का पेड़ हुआ करता था ...

हराभरा पेड़ ...

एक शाम यूँही बातों बातोंमें तुमनेही कहाँ था, 

कुछ सौ साल की होगी उम्र इसकी शायद ...

जरासा डरसी गई थी में... बुढा बरगद कहीं टूट पड़ा तो ...

तब तुमने दिखाया था मुझे

उसके हर टेहनी पे बसा एक नया शहर ...

नन्हे परिंदों का प्यारा शहर.…

सुरीले सुरोंमे चहचहाता शहर....

ख्वाबोंका शहर …

भला अब टूटने का डर किसे ...

सुना है कल रात की बारिश का उस बरगद से झगड़ा हुआ.…

बूढ़ा था बरगद..... हार गया.....

सुना है अब वहा कुछ भी नहीं बचा.....

ना नीव ना शाख.... ना ही अकेली कोई जड़.…

फिर वो

परिंदे ??... उनके घर ??...उनके सुर ??.... उनके ख्वाब ??....

एक शहर के ग़ुम होने की रिपोर्ट कही तो दर्ज होगी ना.… 

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